खुद आदर्श बनें, तब बनेगा आदर्श समाज |
भास्कर न्यूज त्न बहादुरगढ़ |
| प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुख्यालय माउंट आबू से आए भगवान भाई ने कहा कि आज की बिगड़ती परिस्थिति को देखते हुए समाज को सुधारने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान के छात्र भावी समाज है। अगर भावी समाज को आदर्श बनाना हैं तो छात्राओं को भौतिक शिक्षा के साथ नैतिक आचरण पर भी उनके ऊपर ध्यान देने की आवश्यकता है। भगवान भाई ने पीडीएम पॉलीटेक्नीक कॉलेज में मंगलवार को टीचिंग स्टाफ और छात्र-छात्राओं के बीच विचार गोष्ठी में कही। उन्होंने कहा कि शिक्षक वही है, जो अपने जीवन की धारणाओं से दूसरों को शिक्षा देता है। शिक्षकों को केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं बल्कि सारे समाज को श्रेष्ठ मार्ग दर्शन देने वाला होना चाहिए है। उन्होंने कहा कि शिक्षक होने के नाते हमारे अंदर सद्गुण होना आवश्यक है। किताबी ज्ञान के साथ-साथ बच्चों को अपने जीवन की धारणाओं के आधार पर नैतिक पाठ भी आवश्यक पढ़ाना चाहिए। शिक्षकों के हाव-भाव, उठना, बैठना, चलना व व्यवहार करना इन बातों का असर भी बच्चों के जीवन में पड़ता है। वहीं स्थानीय ब्रह्मकुमारी राजयोग सेवा केंद्र के संदीप भाई ने कहा कि एक दीपक से पूरा कमरा प्रकाशित होता है। इसी तरह एक शिक्षक से हजारों बच्चे शिक्षित होते हैं। कॉलेज के प्राचार्य एमएम शर्मा ने कहा कि वर्तमान की परिस्थितियों को परिवर्तन करने की जिम्मेवारी शिक्षकों की है। शिक्षकों को स्वयं के आचरण पर ध्यान देने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ तनाव मुक्त रहने की आवश्यकता है। इस मौके पर ओपी रुहिल व राजपाल मौजूद रहे। |
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Monday, January 16, 2012
खुद आदर्श बनें, तब बनेगा आदर्श समाज भास्कर न्यूज त्न बहादुरगढ़ प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के मुख्यालय माउंट आबू से आए भगवान भाई ने
भास्कर न्यूज त्न बहादुरगढ़ नाहरा-नाहरी रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्मकुमारी सेंटर में माउंट आबू से आए राजयोगी भगवान भाई का उनकी विलक्षण प्रतिभा और कर्मठ स
भास्कर न्यूज त्न बहादुरगढ़
नाहरा-नाहरी रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्मकुमारी सेंटर में माउंट आबू से आए राजयोगी भगवान भाई का उनकी विलक्षण प्रतिभा और कर्मठ समाजसेवा के चलते सम्मान किया गया।
सेंटर की संचालिका बीके अंजली बहन ने बताया कि भगवान भाई ने हरियाणा के विभिन्न शहरों में
नैतिक शिक्षा दी हैं।
उन्होंने बताया कि भगवन भाई को इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड के चीफ एडीटर विश्वरूप राय चौधरी द्वारा भी सम्मानित किया गया है। महाराष्ट्र के सांगसी जिले एक साधारण परिवार में जन्मे भगवान भाई को रद्दी की किताबों में ब्रह्मकुमारी सेवा केंद्र के किताबों के कुछ पन्ने मिले।
उन पन्नों ने उनका जीवन बदलकर रख दिया। इसके बाद तीस वर्षों के राजयोग के अभ्यास द्वारा उन्होंने अपना मनोबल व आत्मबल बढ़ाया। इसके फलस्वरूप आज भगवान भाई ने पांच हजार स्कूलों में तथा 800 जेलों में जाकर सेवा का नया रिकार्ड बनाया।
उनके प्रयास से हजारों कैदियों द्वारा अपराध को छोड़कर अपने जीवन में सद्भावना को अपनाया। सम्मान समारोह अवसर पर सेंटर की बीके विनीता, अमृता भी शामिल रहीं।
रेवाड़ी त्न जिला कारागार में प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की ओर से कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में नाम दर
भगाना चाहिए।
उन्होंने जीओ और जीने दो की भावना को विकसित करने का आह्वान किया। इस मौके पर जेल उपाधीक्षक अशोक शर्मा ने ऐसे आयोजनों को निरंतर करते रहने का आह्वान किया।
एक आदर्श समाज में नैतिक सामाजिक व आध्यात्मिक मूल्य प्रचलित होते है। नैतिक मूल्यों का हमें सम्मान करना चाहिए। मूल्य शिक्षा द्वारा ही बेहतर जीवन जीने की
एक आदर्श समाज में नैतिक सामाजिक व आध्यात्मिक मूल्य प्रचलित होते है। नैतिक मूल्यों का हमें सम्मान करना चाहिए। मूल्य शिक्षा द्वारा ही बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है। उक्त उदगार प्रजापिता ब्रम्हकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय मांउट आबु से पधारे हुए राजयोगी ब्रम्हकुमार भगवान भाई ने कहे। वे शारदा विद्या निकेतन और सरस्वती विद्या मंदिर में छात्र छात्राओं को संबोधित करते हुए बोल रहे थे।
भगवान भाई ने कहा लालच भ्रम, बेईमानी, चोरी, ठगी, नकारात्मक विचार मनुष्य को नैतिकता के विरूद्घ आचरण करने के लिए उकराता है। उन्होने बताया कि हमें अनैतिकता का मार्ग छोडकर नैतिकता के तरफ जाना है। जीवन में नैतिक शिक्षा आचरण में लाना ही शिक्षा का मुल उददेश्य है। नैतिक मूल्यों की धारण से आंतरिक शक्तियों का विकास होता है और आत्मबल, मनोबल बढता है। उन्होने कहा कि नैतिक मूल्यों से युक्त जीवन ही सभी को पसंद आता है। सदगुणों की धारणा से ही हम प्रशंसा के पान बन सकते है। उन्होने बताया कि मूल्य ही जीवन की सुदंरता और वरदान है। जीवन में धारण किये हुए मूल्य ही हमारे श्रैष्ठ चरित्र की निशानी है। मूल्यों को जीवन में धारण करने की हमारे मन में आस्था निर्माण करने की आवश्यकता है।
भगवान भाई ने कहा कि मूल्य ही हमारे जीवन की अनमोल निधि है। मूल्यों के आधार से हम अपने जीवन में खुशी प्रदान कर सकते है। मूल्य ही हमारे सच्चे मित्र है। उन्होने आगे बताया कि शिक्षा उददेश्य बंधनों से मुक्ति के तरफ से जाना रही है नैतिक शिक्षा द्वारा प्राप्त मुल्यों के आधार से ही हम निर्वधंन तथा स्वालंबी बन सकत है। मूल्यों के आधार से ही यह चलता है। उन्होने बताया कि अगर मूल्यों का हास होगा तो यह संसार विरान हो जायेगा।
राक्षसी प्रवृत्ति द्वारा जीवन दिन प्रति दिन दुखी अशांत बनता जायेगा। उन्होने बताया कि अगर जीवन मूल्यों को नष्टï करोगे तो हमारा जीवन भी ऐसा ही व्यर्थ नष्टï हो जायेगा। जो मूल्यों की रक्षा करेगा उसकी ही रक्षा मूल्य करेंगे अर्थात वह व्यक्ति अमरत्वा को प्राप्त करेगा। उन्होने बताया कि अमर बनना ही शिक्षा का मूल उददेश्य है। स्थानीय ब्रम्हकुमारीय की संचालिका बीके ज्योति बहन ने सभी को ब्रम्हकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय का परिचय दिया उन्होने बताया कि आधयात्मीकता नही अपनाने का मतलब जीवन में मानवीय नैतिक मुल्य नही अपनाना है।
Friday, January 6, 2012
सकारात्मक सोच से दूर होता है तनाव नीमच , बुधवार, 28 दिसंबर 2011( 22:42 IST ) Webdunia सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति मानसिक एवं शारीरिक रूप से सदैव स्वस्थ



सकारात्मक सोच से दूर होता है तनाव
यह बात ब्रह्माकुमार भगवान भाई ने बुधवार को ब्रह्माकुमारी आश्रम में आयोजित तपस्या शिविर में कही। उन्होंने कहा कि यदि कोई अभी हमारे साथ गलत व्यवहार कर रहा है तो अवश्य हमने भी पूर्व में कभी ऐसा व्यवहार उसके साथ किया होगा, इसलिए यह सोचें कि ऋण चुकाया। प्रमुख वक्ता ब्रह्माकुमारी संस्थान के संभागीय प्रभारी सुरेंद्र भाई ने कहा कि हमारी स्मृति और वृत्ति ही जीवन में सुख-दुःख का आधार है। स्मृति बनती है संग से और वृत्ति बनती है वातावरण से। अतः हमें सदैव सत्संग व आध्यात्मिक वातावरण का चुनाव करना चाहिए। ब्रह्माकुमारी पुष्पा बहन ने सभी शिविरार्थियों को तिलक लगाकर प्रसाद प्रदान किया तथा सविता। बहन ने राजयोग का अभ्यास करवाया। भगवान भाई ने मनासा, रामपुरा व देवरान के कार्यक्रमों में भी भाग लिया व सक्रिय सेवादारों को संबोधित किया-निप्र

Monday, December 19, 2011
ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले. सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असले
अहंकार एक ऐसा मानवीय गुण(अवगुण) है, जो जन्म के बाद से ही हमारे ऊपर नियंत्रण कर लेता है और क्रोध , ईर्ष्या , स्वार्थ ,घृणा , बदले की भावना और अन्य अवगु
अहंकार को सभी धर्मों व् विद्वानों ने धर्म मार्ग की सबसे बड़ी बाधा माना है,
…………………….अहंकार एक ऐसा मानवीय गुण(अवगुण) है, जो जन्म के बाद से ही हमारे ऊपर नियंत्रण कर लेता है और क्रोध , ईर्ष्या , स्वार्थ ,घृणा , बदले की भावना और अन्य अवगुणों को जन्म देता है। यह एक ऐसा विष है जो हमारे सभी गुणों को दूषित कर हमें संसारिकता में फ़साये रखता है ।लेकिन मित्रों, जिस प्रकार विष ही विष को मारता है, उसी प्रकार हम इस अहंकार रूपी विष का प्रयोग करके, अपने स्वभाव व् अंतर्मन में अन्दर तक फैले विभिन्न प्रकार के विषों को मार सकते है। हाँ, जिस प्रकार विष चिकित्सा में सावधानी से काम लेना पड़ता है, उसी प्रकार यहाँ भी सावधानी से काम लेना पड़ेगा। प्रतिदिन आत्म समीक्षा करनी होगी कि यह दवा उपचार ही करती रहे , हानि न पहुँचाने पाए
ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
Posted by BK BHAGWAN BRAHMAKUMARIS MOUNT ABU ARTIKAL at 4:00 AM
अहंकार को सभी धर्मों व् विद्वानों ने धर्म मार्ग की सबसे बड़ी बाधा माना है,
…………………….अहंकार एक ऐसा मानवीय गुण(अवगुण) है, जो जन्म के बाद से ही हमारे ऊपर नियंत्रण कर लेता है और क्रोध , ईर्ष्या , स्वार्थ ,घृणा , बदले की भावना और अन्य अवगुणों को जन्म देता है। यह एक ऐसा विष है जो हमारे सभी गुणों को दूषित कर हमें संसारिकता में फ़साये रखता है ।लेकिन मित्रों, जिस प्रकार विष ही विष को मारता है, उसी प्रकार हम इस अहंकार रूपी विष का प्रयोग करके, अपने स्वभाव व् अंतर्मन में अन्दर तक फैले विभिन्न प्रकार के विषों को मार सकते है। हाँ, जिस प्रकार विष चिकित्सा में सावधानी से काम लेना पड़ता है, उसी प्रकार यहाँ भी सावधानी से काम लेना पड़ेगा। प्रतिदिन आत्म समीक्षा करनी होगी कि यह दवा उपचार ही करती रहे , हानि न पहुँचाने पाए
ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
Posted by BK BHAGWAN BRAHMAKUMARIS MOUNT ABU ARTIKAL at 4:00 AM
करगणी, शेटफळे, पात्रेवाडी, माळेवाडी, तळेवाडी भगवान दगडू चवरे तळेवाडी ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी सांगली महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ
भगवान दगडू चवरे तळेवाडी ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी सांगली
महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नो
महाराष्ट्र मानपत्र : महाराष्ट्राच्या शिरपेचातील मानाचा तूरा : नवरत्नांची खाण असणाया महाराष्ट्राच्या मातीत जन्मलेल्या रत्नांची महिमा सांगणारे स्वतंत्र व्यासपिठ :
रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई
इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नोंदवलायं भगवान भाई यांनी.
12. दिल्ली येथे इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड चे मुख्य संपादक वि·ारुप राय चौधरी हे ब्रा.कु.भगवान भाई (शान्तीवन आबू रोड) यांना प्रमाणपत्र देतांना सोबत इंडिया बुक ऑफ रेकार्डची टीम.
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नो
महाराष्ट्र मानपत्र : महाराष्ट्राच्या शिरपेचातील मानाचा तूरा : नवरत्नांची खाण असणाया महाराष्ट्राच्या मातीत जन्मलेल्या रत्नांची महिमा सांगणारे स्वतंत्र व्यासपिठ :
रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई
इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नोंदवलायं भगवान भाई यांनी.
12. दिल्ली येथे इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड चे मुख्य संपादक वि·ारुप राय चौधरी हे ब्रा.कु.भगवान भाई (शान्तीवन आबू रोड) यांना प्रमाणपत्र देतांना सोबत इंडिया बुक ऑफ रेकार्डची टीम.
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
भगवान दगडू चवरे तळेवाडी ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी सांगली महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नो महाराष्ट्र मा
भगवान दगडू चवरे तळेवाडी ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी सांगली
महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नो
महाराष्ट्र मानपत्र : महाराष्ट्राच्या शिरपेचातील मानाचा तूरा : नवरत्नांची खाण असणाया महाराष्ट्राच्या मातीत जन्मलेल्या रत्नांची महिमा सांगणारे स्वतंत्र व्यासपिठ :
रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई
इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नोंदवलायं भगवान भाई यांनी.
12. दिल्ली येथे इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड चे मुख्य संपादक वि·ारुप राय चौधरी हे ब्रा.कु.भगवान भाई (शान्तीवन आबू रोड) यांना प्रमाणपत्र देतांना सोबत इंडिया बुक ऑफ रेकार्डची टीम.
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
महाराष्ट्र मानपत्र : रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नो
महाराष्ट्र मानपत्र : महाराष्ट्राच्या शिरपेचातील मानाचा तूरा : नवरत्नांची खाण असणाया महाराष्ट्राच्या मातीत जन्मलेल्या रत्नांची महिमा सांगणारे स्वतंत्र व्यासपिठ :
रद्दीच्या कागदावरील शिवसंदेश वाचून एक सफल राजयोगी बनलेले : ब्राहृाकुमार भगवान भाई
इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड मधे सुवर्णाक्षरानी नाव नोंदवलायं भगवान भाई यांनी.
12. दिल्ली येथे इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड चे मुख्य संपादक वि·ारुप राय चौधरी हे ब्रा.कु.भगवान भाई (शान्तीवन आबू रोड) यांना प्रमाणपत्र देतांना सोबत इंडिया बुक ऑफ रेकार्डची टीम.
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
आत्मा क्या है और मन क्या है ? अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने प
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
आत्मा क्या है और मन क्या है ?
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की " आप कौन है ?" अथवा "आपका क्या परिचय है ?" तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में " में " शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता "आत्मा " का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -"भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I
Monday, November 21, 2011
ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड'
सातारा, दि. 15 : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालयाचे मुख्यालय असलेल्या माऊंट अबू येथील ब्रह्माकुमार भगवानभाईंनी केलेल्या उल्लेखनीय कामगिरीची दखल घेवून त्यांच्या कार्याची "इंडिया बुक ऑफ रेकार्ड' मध्ये नुकतीच नोंद झाली असून दिल्ली येथे एका विशेष समारंभामध्ये इंडिया बुक ऑफ रेकार्डचे मुख्य संपादक विश्वरूपराय चौधरी यांच्या हस्ते त्यांना सन्मानित करण्यात आले.
भगवानभाईंनी आतापर्यंत भारतातील विविध प्रांतातील 5000 शाळा, महाविद्यालयांमध्ये जाऊन लाखो विद्यार्थ्यांना मूल्यनिष्ठ शिक्षणाद्वारे नैतिक व अध्यात्मिक विकासासाठी उद्बोधन केले आहे. 800 कारागृहांमध्ये जाऊन हजारो कैद्यांना गुन्हेगारी सोडून आपल्या जीवनामध्ये सद्भावना, मूल्य तसेच मानवतेला स्थापित करण्यासाठी प्रेरित केले आहे. या कार्याची नोंद घेवून त्यांची या पुरस्कारासाठी निवड करण्यात आली.
सत्कारानंतर प्रतिक्रिया व्यक्त करताना ब्र. कु.भगवानभाई म्हणाले, समाजामधील भ्रष्टाचार, व्यसनाधिनता, गुन्हेगारी समाप्त करावयाची असेल तर त्यासाठी शिक्षणामध्ये परिवर्तनाची आवश्यकता आहे. शाळा/ महाविद्यालयांमधूनच समाजाच्या प्रत्येक क्षेत्रामध्ये व्यक्ती प्रवेश करते. आजचा विद्यार्थीच उद्याचा समाज आहे. म्हणूनच समाजाच्या विकासासाठी शिक्षणामध्ये मूल्य व अध्यात्मिकतेचा समावेश करण्याची आवश्यकता आहे.
सांगली जिल्ह्यात आटपाडी तालुक्यातील तळेवाडी या छोट्याशा खेड्यात एका निरक्षर व गरीब कुटुंबात जन्मलेल्या भगवानभाईंना लिहिण्या- वाचण्यासाठी वही, पुस्तकेसुध्दा मिळत नव्हती. वयाच्या 11 वर्षी त्यांनी शाळेत जायला सुरूवात केली. ते जुन्या रद्दीमधील वह्यांची कोरी पाने व शाईने लिहिलेली पाने पाण्याने धुवून, सुकवून त्या पानांचा उपयोग लिहिण्यासाठी करीत. अशाच रद्दीमध्ये त्यांना ब्रह्माकुमारी संस्थेच्या एका पुस्तकाची काही पाने मिळाली. या रद्दीतील पानानींच त्यांचे जीवन बदलून गेले. त्या पानावर असलेल्या पत्त्यावरून ते ब्रह्माकुमारीसंस्थेमध्ये पोहचले व तेथील ईश्वरीय ज्ञान व राजयोगाचा अभ्यास करून आपले मनोबल वाढविले व त्या फलस्वरूप माऊंट अबू येथील आपले सेवाकार्य सांभाळून आजपर्यंत त्यांनी 5000 शाळा, महाविद्यालये व 800 कारागृहात जाऊन या सेवेचे एक रेकॉर्ड प्रस्थापित केले.
वर्तमानसमयी ब्रह्माकुमार भगवानभाई ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालयाच्या शांतीवन या मुख्यालयातील विशाल किचनमध्ये सेवारत असून अनेक मासिकातून तसेच वृत्तपत्रातून आतापर्यंत 2000 हून अधिक लेख लिहिले आहेत. त्यांना मिळालेल्या या सन्मानाबद्दल सातारा सेवाकेंद्राच्या संचालिका ब्रह्माकुमारी रूक्मिणी बहेनजी व शिक्षणाधिकारी (माध्य.) मकरंद गोंधळी यांनी त्यांचे अभिनंदन केले.
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