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Monday, January 16, 2012

समाज सुधार में शिक्षकों की भूमिका अहम Jan 10, 07:32 pm बताएं बहादुरगढ़, जागरण संवाद केंद्र : समाज को सुधारने के लिए आदर्श शिक्षकों की आवश्यकता है क्य



समाज सुधार में शिक्षकों की भूमिका अहम

Jan 10, 07:32 pm

बहादुरगढ़, जागरण संवाद केंद्र : समाज को सुधारने के लिए आदर्श शिक्षकों की आवश्यकता है क्योंकि शिक्षक ही समाज शिल्पी हैं। यह विचार प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू के राजयोगी ब्रह्मकुमार भगवान ने व्यक्त किए। वे पीडीएम पोलिटेक्निक में अध्यापकों को आदर्श शिक्षक विषय पर संबोधित कर रहे थे।

भगवान भाई ने कहा कि आज की बिगड़ती परिस्थिति को देखते हुए समाज को सुधारने की बहुत आवश्यकता है। वर्तमान के छात्र भावी समाज है। अगर भावी समाज को आदर्श बनाना है तो छात्राओं को भौतिक शिक्षा के साथ नैतिक आचरण पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षक वही है जो अपने जीवन की धारणाओं से दूसरों को शिक्षा देता है। धारणाओं से विद्यार्थियों में बल भरता है। जीवन की धारणाओं से वाणी, कर्म, व्यवहार और व्यक्तित्व में निखार आ जाता है। शिक्षा देने के बाद भी अगर बच्चे बिगड़ रहे है तो इसका मतलब मूर्तिकार में भी कुछ कमी है। शिक्षकों को केवल पाठ पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं बल्कि समाज को श्रेष्ठ मार्ग दर्शन देने वाला शिक्षक बनना है। उन्होंने कहा कि शिक्षक होने के नाते हमारे अंदर सद्गुण होना आवश्यक है। किताबी ज्ञान के साथ-साथ बच्चों को अपने जीवन की धारणाओं के आधार पर नैतिक पाठ भी आवश्यक पढ़ाना चाहिए। शिक्षकों के हाव-भाव, उठना, बोलना, चलना व व्यवहार करना इन बातों का असर भी बच्चों के जीवन में पड़ता है। उन्होंने कहा कि अब समाज को शिक्षित करने का शिक्षा देने के स्वरूप को बदलने की आवश्यकता है। स्वयं के आचरण से शिक्षा देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि समाज को सुधारने की अहम भूमिका शिक्षकों की है। प्राचीन भारत में स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी जैसे महान पुरुष समाज में शिक्षक के रूप में थे। हमें विद्यार्थियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाकर उन्हे गुणवान, चरित्रवान, दिव्य, संस्कारवान बनाने की आवश्यकता है। वहीं स्थानीय ब्रह्मकुमारी राजयोग सेवा केंद्र के ब्रह्मकुमार संदीप भाई ने कहा कि एक दीपक से पूरा कमरा प्रकाशित होता है। इसी तरह एक शिक्षक से हजारों बच्चे शिक्षित होते है और वे उजाले का काम करते है। प्राचार्य एमएम शर्मा ने कहा कि वर्तमान की परिस्थितियों को परिवर्तन करने की जिम्मेवारी शिक्षकों की है। शिक्षकों को स्वयं के आचरण पर ध्यान देने के लिए अध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ तनाव मुक्त रहने की आवश्यकता है। इस मौके पर ओपी रुहिल व राजपाल उपस्थित रहे।

भास्कर न्यूज त्न बहादुरगढ़ नाहरा-नाहरी रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्मकुमारी सेंटर में माउंट आबू से आए राजयोगी भगवान भाई का उनकी विलक्षण प्रतिभा और कर्मठ स


भास्कर न्यूज त्न बहादुरगढ़
नाहरा-नाहरी रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्मकुमारी सेंटर में माउंट आबू से आए राजयोगी भगवान भाई का उनकी विलक्षण प्रतिभा और कर्मठ समाजसेवा के चलते सम्मान किया गया।
सेंटर की संचालिका बीके अंजली बहन ने बताया कि भगवान भाई ने हरियाणा के विभिन्न शहरों में
नैतिक शिक्षा दी हैं।
उन्होंने बताया कि भगवन भाई को इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड के चीफ एडीटर विश्वरूप राय चौधरी द्वारा भी सम्मानित किया गया है। महाराष्ट्र के सांगसी जिले एक साधारण परिवार में जन्मे भगवान भाई को रद्दी की किताबों में ब्रह्मकुमारी सेवा केंद्र के किताबों के कुछ पन्ने मिले।
उन पन्नों ने उनका जीवन बदलकर रख दिया। इसके बाद तीस वर्षों के राजयोग के अभ्यास द्वारा उन्होंने अपना मनोबल व आत्मबल बढ़ाया। इसके फलस्वरूप आज भगवान भाई ने पांच हजार स्कूलों में तथा 800 जेलों में जाकर सेवा का नया रिकार्ड बनाया।
उनके प्रयास से हजारों कैदियों द्वारा अपराध को छोड़कर अपने जीवन में सद्भावना को अपनाया। सम्मान समारोह अवसर पर सेंटर की बीके विनीता, अमृता भी शामिल रहीं।

Friday, January 6, 2012

हम भगवान् के बारे में क्या जानते हैं की वो हमारे मालिक हैं और हम उनके दास-दासीआन .पर इस तरह के रिश्ते में एक भय की अनुभूति होती है की अगर ये न किया तो


हम भगवान् के बारे में क्या जानते हैं की वो हमारे मालिक हैं और हम उनके दास-दासीआन .पर इस तरह के रिश्ते में एक भय की अनुभूति होती है की अगर ये न किया तो भगवान् रुष्ट हो जायेंगें वो न किया तो भगवान् रुष्ट हो जायेंगें. इस तरह भगवान् से हम दूर होते जाते हैं.भगवान् की सत्ता से हम इनकार नहीं करते हैं पर किस प्रकार हम प्रभु से कैसा रिश्ता बनाएं की हम प्रभु को पिता कह सकें.हमारे दो पिता हैं एक लौकिक और परलौकिक .लौकिक पिता जिन्होनें हमें संसार में एक प्राणी के रूप में जीवनदान दिया और दुसरे पारलौकिक पिता जो जगतपिता हैं.हम अपने लौकिक पिता से जैसा रिश्ता बना के रखते हैं वैसा ही रिश्ता हम पारलौकिक पिता को भी अपना कर अपना जीवन सफल कर सकते हैं.ये शिक्षा हमें ब्रह्मकुमार -ब्रह्मकुमारियों द्वारा दी जा रही है.यह एक संस्था के रूप में उभर रही है ,जहाँ लोग संसार के झमेलों से परेशान हो कर यहाँ शरण लेते हैं,जहाँ उन्हें उनके कई प्रश्नों के उत्तर जिनकी तलाश में भटक रहे थे वे पा लेते हैं.इस संस्था के संस्थापक दादा लेखराज हैं जिन्हें आज प्रजापिता ब्रह्मा के नाम से जाना जाता है.इसके विश्व के ७२ देशों में ४,५०० केंद्र हैं जो इन कार्यक्रमों को चला रहे हैं.
जिस तरह की शिक्षा पर यहाँ जोर दिया जाता है वोह इस प्रकार है की हम शरीर न होकर एक आत्मा हैं इस तरह से हम बाह्यमुखी न होकर अंतर्मुखी हो जाते हैं और दुनिया के विषयों में हमारा मन भटकने से बच जाता है.अंतर्मुखता सभी दिव्य गुणों की खान है.इसका अर्थ ये है की मनुष्य अपनी इन्द्रियों से जैसे आंख से वही दृश्य देखे,कानों से वही बातें सुनें,वही वचन बोले,वैसा ही भोजन करे जिससे की देह के अन्दर स्थित आत्मा की उन्नति हो.मानुष देह के कारण अभिमान करता है तो उसे देह्भिमानी कहते हैं पर जब वो स्वयं को एक आत्मा के रूप में देखता है तो उसे देहिभिमानी कहते हैं.दिव्य गुणों में एक गुण है सहनशीलता और धैर्य.किसी भी उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहन करना पड़ता है.यदि मनुष्य किसी कष्टकारी परिस्थिति को सहन नहीं करेगा तो उसमे क्रोध उत्पन्न होगा.ये जलन,द्वेष,क्रोध आदि पवित्रता अथवा विकारों में ही तो गिने जाते हैं.निंदा को फूल और निंदक को भक्त मनो.अत:जब कोई मनुष्य निंदा करता है तो ऐसा सोचो की ये निंदा फूल बनती जा रही है.मुश्किलों को सहन करोगे तो मलूक बनोगे.परिस्थिति को परीक्षा-पत्र समझो.धीरज धरने और बीतती को बिसरने से ही लाभ.धैर्य खोने से निर्णय-शक्ति ख़राब होती और स्वास्थ भी ख़राब होता है.हर्षितमुखता एक ऐसा गुण है इसे धारण करने से ज्ञानवान मनुष्य की न केवल अपनी अवस्था आनंदमयी होती है बल्कि इस द्वारा दुसरे लोगों की भी अलौकिक सेवा होती है.यह एक सेवाकारी गुण है.जो मनुष्य दिव्य गुण रुपी रत्ना मोती चुगता है और दुर्गुण रुपी कंकड़ छोड़ देता है अथवा पवित्रता रुपी क्षीर ले लेता है,वो मनुष्य हंसा के समान है और हर्षितमुख रह सकता है.अहंकार थोडा भी क्यों न हो अकल्याणकारी होता है.सभी दिव्य गुणों में संतोष ही शिरोमणि है.संतोषी ही सुखी भी सुखदायक भी.असंतुष्ट व्यक्ति वातावरण बिगाड़ता है.त्याग जैसे दिव्य गुण धारण करने से मानव महान बनता है.लोक-लाज,निंदा स्तुति तथा मान-उपमान का त्याग हो.अशुद्ध संकल्पों का त्याग,ज्ञान से निश्चय, निश्चय से त्याग, त्याग से प्राप्ति संभव है . यदि मनुष्य में दिव्य गुण हों तो उस मनुष्य से बहुत ही कम लोग बिगड़ेंगे,
नम्रता और निरहंकारिता भी बहुत उच्च दिव्य गुण हैं, इन्हें धारण करने वाला मनुष्य टूटता नहीं है क्यूंकि उसमें लचक होती है अतः उसका सभी से स्नेह और सम्बन्ध बना रहता है. सरलता मन की सफाई है, कुटिलता कचड़ा है. सरलता से मनुष्य स्वस्थ होता है. गंभीरता जिस मनुष्य में होती है वह हर एक कार्य सोच समझ कर करता है, इसीलिए उसे कार्य में सफलता मिलती है. गमभीर मनुष्य को धन, शक्ति, समय और जीवन की बचत होती है. वे व्यर्थ नहीं होते. निर्भयता जीवन-दान देने वाली है. निर्भय मनुष्य सब विघ्नों से छुट जाता है. अडोल रहने वाले को ही सतयुग में अडोल सिंहासन मिलता है.
इस प्रकार हम देखते हैं की एक-एक गुण अपार सुख देने वाला है. इस तरह की शिक्षा से मानव स्वयं के भीतर शांति स्थापित कर पायेगा और विश्व शांति के भी प्रयास करेगा.
मानव कल्याण के लिए ब्रह्माकुमारी द्वारा किये जा रहे ये प्रयास निश्चित रूप से सफल होंगे.

मैं कौन हु मनुष्य अपने जीवन में कई पहेलिय हल करते है और उसके फलस्वरूप ईनाम भी पाते है परन्तु इस छोटी पहेली का हल कोई नही जानता कि -- मै कौन हूँ



मैं कौन हु
मनुष्य अपने जीवन में कई पहेलिय हल करते है और उसके फलस्वरूप ईनाम भी पाते है परन्तु इस छोटी पहेली का हल कोई नही जानता कि -- मै कौन हूँ ? यो तो हर-एक मनुष्य सारा दिन में-में कहता ही रहता है , परन्तु उससे पूछा जाये कि मै कहने वाला कौन ? तो वह कहेगा कि - मै लालचंद हु परन्तु सोचह जाये तो वास्तव मै यह तो शरीर का नाम है, शरीर तो "मेरा" है मै तो शरीर से अलग हूँ बस, इस छोटी सी पहेली का प्रेक्टिकल हल न जानने के कारण, अर्थात स्वयं को न जानने के कारण, आज सभी मनुष्य देह-अभिमानी है और सभी काम, क्रोधादि विकारो के वश है तथा दुखी है I
अब परमपिता परमात्मा कहते है कि --" आज मनुष्य में घमंड तो इतना है कि वह समझता है कि --"मै सेठ हु, स्वामी हु, अफसर हु,...." परन्तु उसमे अजयन इतना है कि वह स्वयं को भी नही जानता " मै कौन हु यह सृष्टि रूपी खेल आदि से अंत तक कैसे बना हुआ है, मै इसमे कहा से आया, कब आया, कैसे सुख शांति का राज्य गवाया तथा परमप्रिय परमपिता परमात्मा ( इस सृष्टि के रचयिता) कौन है ? इन रहस्यों को कोई भी नही जानता अब जीवन कि इस पहेली को फिर से जानकर मनुष्य देहि-अभिमानी बन सकता है और फिर उसके फलस्वरूप नर को श्री नारायण और नारी को श्री लक्ष्मी पद कि प्राप्ति होती है और मनुष्य को मुक्ति तथा जीवन मुक्ति मिल जाती है वह सम्पूर्ण पवित्रता, सुख और शांति को पा लेता है I

हम भगवान् के बारे में क्या जानते हैं की वो हमारे मालिक हैं और हम उनके दास-दासीआन .पर इस तरह के रिश्ते में एक भय की अनुभूति होती है की अगर ये न किया तो



हम भगवान् के बारे में क्या जानते हैं की वो हमारे मालिक हैं और हम उनके दास-दासीआन .पर इस तरह के रिश्ते में एक भय की अनुभूति होती है की अगर ये न किया तो भगवान् रुष्ट हो जायेंगें वो न किया तो भगवान् रुष्ट हो जायेंगें. इस तरह भगवान् से हम दूर होते जाते हैं.भगवान् की सत्ता से हम इनकार नहीं करते हैं पर किस प्रकार हम प्रभु से कैसा रिश्ता बनाएं की हम प्रभु को पिता कह सकें.हमारे दो पिता हैं एक लौकिक और परलौकिक .लौकिक पिता जिन्होनें हमें संसार में एक प्राणी के रूप में जीवनदान दिया और दुसरे पारलौकिक पिता जो जगतपिता हैं.हम अपने लौकिक पिता से जैसा रिश्ता बना के रखते हैं वैसा ही रिश्ता हम पारलौकिक पिता को भी अपना कर अपना जीवन सफल कर सकते हैं.ये शिक्षा हमें ब्रह्मकुमार -ब्रह्मकुमारियों द्वारा दी जा रही है.यह एक संस्था के रूप में उभर रही है ,जहाँ लोग संसार के झमेलों से परेशान हो कर यहाँ शरण लेते हैं,जहाँ उन्हें उनके कई प्रश्नों के उत्तर जिनकी तलाश में भटक रहे थे वे पा लेते हैं.इस संस्था के संस्थापक दादा लेखराज हैं जिन्हें आज प्रजापिता ब्रह्मा के नाम से जाना जाता है.इसके विश्व के ७२ देशों में ४,५०० केंद्र हैं जो इन कार्यक्रमों को चला रहे हैं.
जिस तरह की शिक्षा पर यहाँ जोर दिया जाता है वोह इस प्रकार है की हम शरीर न होकर एक आत्मा हैं इस तरह से हम बाह्यमुखी न होकर अंतर्मुखी हो जाते हैं और दुनिया के विषयों में हमारा मन भटकने से बच जाता है.अंतर्मुखता सभी दिव्य गुणों की खान है.इसका अर्थ ये है की मनुष्य अपनी इन्द्रियों से जैसे आंख से वही दृश्य देखे,कानों से वही बातें सुनें,वही वचन बोले,वैसा ही भोजन करे जिससे की देह के अन्दर स्थित आत्मा की उन्नति हो.मानुष देह के कारण अभिमान करता है तो उसे देह्भिमानी कहते हैं पर जब वो स्वयं को एक आत्मा के रूप में देखता है तो उसे देहिभिमानी कहते हैं.दिव्य गुणों में एक गुण है सहनशीलता और धैर्य.किसी भी उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहन करना पड़ता है.यदि मनुष्य किसी कष्टकारी परिस्थिति को सहन नहीं करेगा तो उसमे क्रोध उत्पन्न होगा.ये जलन,द्वेष,क्रोध आदि पवित्रता अथवा विकारों में ही तो गिने जाते हैं.निंदा को फूल और निंदक को भक्त मनो.अत:जब कोई मनुष्य निंदा करता है तो ऐसा सोचो की ये निंदा फूल बनती जा रही है.मुश्किलों को सहन करोगे तो मलूक बनोगे.परिस्थिति को परीक्षा-पत्र समझो.धीरज धरने और बीतती को बिसरने से ही लाभ.धैर्य खोने से निर्णय-शक्ति ख़राब होती और स्वास्थ भी ख़राब होता है.हर्षितमुखता एक ऐसा गुण है इसे धारण करने से ज्ञानवान मनुष्य की न केवल अपनी अवस्था आनंदमयी होती है बल्कि इस द्वारा दुसरे लोगों की भी अलौकिक सेवा होती है.यह एक सेवाकारी गुण है.जो मनुष्य दिव्य गुण रुपी रत्ना मोती चुगता है और दुर्गुण रुपी कंकड़ छोड़ देता है अथवा पवित्रता रुपी क्षीर ले लेता है,वो मनुष्य हंसा के समान है और हर्षितमुख रह सकता है.अहंकार थोडा भी क्यों न हो अकल्याणकारी होता है.सभी दिव्य गुणों में संतोष ही शिरोमणि है.संतोषी ही सुखी भी सुखदायक भी.असंतुष्ट व्यक्ति वातावरण बिगाड़ता है.त्याग जैसे दिव्य गुण धारण करने से मानव महान बनता है.लोक-लाज,निंदा स्तुति तथा मान-उपमान का त्याग हो.अशुद्ध संकल्पों का त्याग,ज्ञान से निश्चय, निश्चय से त्याग, त्याग से प्राप्ति संभव है . यदि मनुष्य में दिव्य गुण हों तो उस मनुष्य से बहुत ही कम लोग बिगड़ेंगे,
नम्रता और निरहंकारिता भी बहुत उच्च दिव्य गुण हैं, इन्हें धारण करने वाला मनुष्य टूटता नहीं है क्यूंकि उसमें लचक होती है अतः उसका सभी से स्नेह और सम्बन्ध बना रहता है. सरलता मन की सफाई है, कुटिलता कचड़ा है. सरलता से मनुष्य स्वस्थ होता है. गंभीरता जिस मनुष्य में होती है वह हर एक कार्य सोच समझ कर करता है, इसीलिए उसे कार्य में सफलता मिलती है. गमभीर मनुष्य को धन, शक्ति, समय और जीवन की बचत होती है. वे व्यर्थ नहीं होते. निर्भयता जीवन-दान देने वाली है. निर्भय मनुष्य सब विघ्नों से छुट जाता है. अडोल रहने वाले को ही सतयुग में अडोल सिंहासन मिलता है.
इस प्रकार हम देखते हैं की एक-एक गुण अपार सुख देने वाला है. इस तरह की शिक्षा से मानव स्वयं के भीतर शांति स्थापित कर पायेगा और विश्व शांति के भी प्रयास करेगा.
मानव कल्याण के लिए ब्रह्माकुमारी द्वारा किये जा रहे ये प्रयास निश्चित रूप से सफल होंगे.