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Friday, January 6, 2012

हम भगवान् के बारे में क्या जानते हैं की वो हमारे मालिक हैं और हम उनके दास-दासीआन .पर इस तरह के रिश्ते में एक भय की अनुभूति होती है की अगर ये न किया तो



हम भगवान् के बारे में क्या जानते हैं की वो हमारे मालिक हैं और हम उनके दास-दासीआन .पर इस तरह के रिश्ते में एक भय की अनुभूति होती है की अगर ये न किया तो भगवान् रुष्ट हो जायेंगें वो न किया तो भगवान् रुष्ट हो जायेंगें. इस तरह भगवान् से हम दूर होते जाते हैं.भगवान् की सत्ता से हम इनकार नहीं करते हैं पर किस प्रकार हम प्रभु से कैसा रिश्ता बनाएं की हम प्रभु को पिता कह सकें.हमारे दो पिता हैं एक लौकिक और परलौकिक .लौकिक पिता जिन्होनें हमें संसार में एक प्राणी के रूप में जीवनदान दिया और दुसरे पारलौकिक पिता जो जगतपिता हैं.हम अपने लौकिक पिता से जैसा रिश्ता बना के रखते हैं वैसा ही रिश्ता हम पारलौकिक पिता को भी अपना कर अपना जीवन सफल कर सकते हैं.ये शिक्षा हमें ब्रह्मकुमार -ब्रह्मकुमारियों द्वारा दी जा रही है.यह एक संस्था के रूप में उभर रही है ,जहाँ लोग संसार के झमेलों से परेशान हो कर यहाँ शरण लेते हैं,जहाँ उन्हें उनके कई प्रश्नों के उत्तर जिनकी तलाश में भटक रहे थे वे पा लेते हैं.इस संस्था के संस्थापक दादा लेखराज हैं जिन्हें आज प्रजापिता ब्रह्मा के नाम से जाना जाता है.इसके विश्व के ७२ देशों में ४,५०० केंद्र हैं जो इन कार्यक्रमों को चला रहे हैं.
जिस तरह की शिक्षा पर यहाँ जोर दिया जाता है वोह इस प्रकार है की हम शरीर न होकर एक आत्मा हैं इस तरह से हम बाह्यमुखी न होकर अंतर्मुखी हो जाते हैं और दुनिया के विषयों में हमारा मन भटकने से बच जाता है.अंतर्मुखता सभी दिव्य गुणों की खान है.इसका अर्थ ये है की मनुष्य अपनी इन्द्रियों से जैसे आंख से वही दृश्य देखे,कानों से वही बातें सुनें,वही वचन बोले,वैसा ही भोजन करे जिससे की देह के अन्दर स्थित आत्मा की उन्नति हो.मानुष देह के कारण अभिमान करता है तो उसे देह्भिमानी कहते हैं पर जब वो स्वयं को एक आत्मा के रूप में देखता है तो उसे देहिभिमानी कहते हैं.दिव्य गुणों में एक गुण है सहनशीलता और धैर्य.किसी भी उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहन करना पड़ता है.यदि मनुष्य किसी कष्टकारी परिस्थिति को सहन नहीं करेगा तो उसमे क्रोध उत्पन्न होगा.ये जलन,द्वेष,क्रोध आदि पवित्रता अथवा विकारों में ही तो गिने जाते हैं.निंदा को फूल और निंदक को भक्त मनो.अत:जब कोई मनुष्य निंदा करता है तो ऐसा सोचो की ये निंदा फूल बनती जा रही है.मुश्किलों को सहन करोगे तो मलूक बनोगे.परिस्थिति को परीक्षा-पत्र समझो.धीरज धरने और बीतती को बिसरने से ही लाभ.धैर्य खोने से निर्णय-शक्ति ख़राब होती और स्वास्थ भी ख़राब होता है.हर्षितमुखता एक ऐसा गुण है इसे धारण करने से ज्ञानवान मनुष्य की न केवल अपनी अवस्था आनंदमयी होती है बल्कि इस द्वारा दुसरे लोगों की भी अलौकिक सेवा होती है.यह एक सेवाकारी गुण है.जो मनुष्य दिव्य गुण रुपी रत्ना मोती चुगता है और दुर्गुण रुपी कंकड़ छोड़ देता है अथवा पवित्रता रुपी क्षीर ले लेता है,वो मनुष्य हंसा के समान है और हर्षितमुख रह सकता है.अहंकार थोडा भी क्यों न हो अकल्याणकारी होता है.सभी दिव्य गुणों में संतोष ही शिरोमणि है.संतोषी ही सुखी भी सुखदायक भी.असंतुष्ट व्यक्ति वातावरण बिगाड़ता है.त्याग जैसे दिव्य गुण धारण करने से मानव महान बनता है.लोक-लाज,निंदा स्तुति तथा मान-उपमान का त्याग हो.अशुद्ध संकल्पों का त्याग,ज्ञान से निश्चय, निश्चय से त्याग, त्याग से प्राप्ति संभव है . यदि मनुष्य में दिव्य गुण हों तो उस मनुष्य से बहुत ही कम लोग बिगड़ेंगे,
नम्रता और निरहंकारिता भी बहुत उच्च दिव्य गुण हैं, इन्हें धारण करने वाला मनुष्य टूटता नहीं है क्यूंकि उसमें लचक होती है अतः उसका सभी से स्नेह और सम्बन्ध बना रहता है. सरलता मन की सफाई है, कुटिलता कचड़ा है. सरलता से मनुष्य स्वस्थ होता है. गंभीरता जिस मनुष्य में होती है वह हर एक कार्य सोच समझ कर करता है, इसीलिए उसे कार्य में सफलता मिलती है. गमभीर मनुष्य को धन, शक्ति, समय और जीवन की बचत होती है. वे व्यर्थ नहीं होते. निर्भयता जीवन-दान देने वाली है. निर्भय मनुष्य सब विघ्नों से छुट जाता है. अडोल रहने वाले को ही सतयुग में अडोल सिंहासन मिलता है.
इस प्रकार हम देखते हैं की एक-एक गुण अपार सुख देने वाला है. इस तरह की शिक्षा से मानव स्वयं के भीतर शांति स्थापित कर पायेगा और विश्व शांति के भी प्रयास करेगा.
मानव कल्याण के लिए ब्रह्माकुमारी द्वारा किये जा रहे ये प्रयास निश्चित रूप से सफल होंगे.

Thursday, December 29, 2011

नकारात्मक सोच ही टेंशन की मूल जड़- भगवान भाई सिटी रिपोर्टर त्न नीमच सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति मानसिक एवं शारीरिक रूप से सदैव स्वस्थ रहता है। नकारात्

नकारात्मक सोच ही टेंशन की मूल जड़- भगवान भाई

सिटी रिपोर्टर त्न नीमच
सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति मानसिक एवं शारीरिक रूप से सदैव स्वस्थ रहता है। नकारात्मक सोच ही टेंशन की मूल जड़ है जिससे अनेक प्रकार के मानसिक व शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। इसलिए मनुष्य को जीवन में नकारात्मक भावों से हमेशा दुर रहना चाहिए।

यह बात ब्रह्मकुमार भगवानभाई ने बुधवार को ज्ञान मार्ग स्थित ब्रह्मकुमारी संस्थान के सद्भावना सभागार में आयोजित आध्यात्मिक सत्संग में कही। उन्होंने उपस्थितजन को न्यूटन के गति नियमों के बारे में भी समझाया। उन्होंने कहा हमारी स्मृति और वृत्ति ही जीवन में सुख-दु:ख का आधार है। हमें सदैव सत्संग व आध्यात्मिक वातावरण का चुनाव करना चाहिए। इससे जीवन में हमेशा खुशी मिलती है।

कार्यक्रम के दौरान राजयोगिनी पुष्पा बहन ने सभी शिविरार्थियों को तिलक व प्रसाद प्रदान किया। उन्होंने बताया भगवान भाई ने 800 से अधिक जेलों में कार्यक्रम प्रस्तुत कर हजारों अपराधियों का जीवन सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। सभागार में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।